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मेघ निमंत्रण

                
                                                         
                            पावस आए मन हर्षाए , लागे गांव सुहावन रे ।
                                                                 
                            
हे सावन के कारे बदरा , गांव हमारे आवन रे ।।

धूल भरी चल रही हवा है ,
जल जीवन नहीं गांवन रे ।
गहन ग्रीष्म से दुखी सभी हैं ,
लागे गांव न भावन रे ।।
पर्वत झरने मौन हो रहे , लागे गांव ना भावन रे।
हे सावन के कारे बदरा , गांव हमारे आवन रे ।।

शहर गली सब व्याकुल इतना ,
तन से टपके चुए पसीना ।
वस्त्र बिना वनवासी जैसे ,
तपते जिनका छत है टीना ।।
जीव जंतु खग विहग तड़पते,वन में आए सावन रे ।
हे सावन के कारे बदरा , गांव हमारे आवन रे ।।

फटी शुष्क खेतों की माटी,
जल गई सारी घास रे ।
झर झर झरते पात पेड़ से ,
लगती डाल उदास रे ।।
कृष्ण मेघ की बाट जोहते ,मीन खोजे जल प्लावन रे ।
हे सावन के कारे बदरा , गांव हमारे आवन रे ।।

खेतों के रखवाले तुम हो ,
तुमको कृषक पुकारे रे ।
जनता भी चुपचाप खड़ी है ,
कब से तुझे निहारे रे ।।
सुखे पोखर कुआं गांव के , रही नदी ना पावन रे ।
हे सावन के कारे बदरा , गांव हमारे आवन रे ।।

 
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2 महीने पहले

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