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चाँद और वो

                
                                                         
                            ऐ चाँद, तुझे कौन तकता है,
                                                                 
                            
किसके लिए तू रात भर जगता है?

क्या तूने भी किया है इश्क़ उससे?
बता दे उसको—
तुझमें उसे देख रहा हूँ मैं,
तेरी ओट में आँखें सेंक रहा हूँ मैं।

वो भी तुझे देख रही है क्या?
तेरी ओट से आँखें सेंक रही है क्या?

क्या वो भी मेरी तरह तन्हा होती है?
मैं रोता हूँ तो वो भी रोती है?
क्या तगादा उसे भी मेरी यादों का होता है,
या मैं जागता हूँ और वो सोता है?

महकता है मेरी यादों से वो भी,
बहकता है किए वादों से वो भी।

वो रातों का ख़सारा याद है क्या?
उसे मिलना हमारा याद है क्या?

वो कमरा याद आता है उसे भी?
वो पटरी वापस बुलाती है उसे भी?

क्या वो भी कर रही है याद मुझको?
क्या वो भी तक रही है तुझमें मुझको?

क्या देगा तू मेरा पैग़ाम उसको,
लिफ़ाफ़े में मेरा नाम उसको?

ऐ चाँद, तू जाना वहाँ पे,
मेरे ग़म की पिटारी खोल देना।
कई क़िस्से सुनाकर उसको मेरे,
फिर उसको तन्हा करके छोड़ देना...

फिर उसको तन्हा करके छोड़ देना।
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2 घंटे पहले

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