लगता है जैसे अपनी कुछ सांसे रूठ गई हैं
हाथों से जबसे अपने जो किताबें छूट गई हैं
दिन भर आँखे तकती हैं तस्वीरें कितनी ही
पढ़ने लिखने की विरासत सारी छूट गई हैं ||
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