माटी हिंदुस्तानी
यूँ ही नहीं लहराता शान से
तीन रंगों का तिरंगा,
इसके लिए न जाने कितनों ने अपनी
जान गँवाई है।
वर्षों तक चली आज़ादी की लड़ाई है,
हर भारतवासी ने मिलकर
भारत की कभी मुग़ल तो कभी अंग्रेजों
से आज़ादी कराई है।
महाराणा और पृथ्वीराज चौहान जैसे
वीर योद्धाओं ने न जाने
कितने अकबर और मोहम्मद ग़ोरी जैसे
धुरंधरों को धूल चटाई है।
झाँसी की रानी जैसी बनीं न
जाने कितनी लक्ष्मीबाई हैं,
ज़रूरत पड़ने पर चूड़ी वाले
हाथों ने भी तलवार उठाई है।
कहने को तो कोई हिंदू, मुस्लिम,
कोई सिख, ईसाई है,
लेकिन आँच आए जब मातृभूमि पर,
तो बने सब भाई-भाई हैं।
किसी ने अपने बुढ़ापे की लाठी गँवाई है,
तो किसी ने रंगों की दुनिया से दूरी बनाई है।
देख माँ की सूनी आँखें, आँख भर आई है,
कितनी बहनों ने राखी बिन भाई के मनाई है।
ना भूलना उन पुरखों की वो सीख पुरानी,
कि गाँधीजी ने हमको
अहिंसा और प्रेम से लड़ने की कला
सिखाई है।
मज़हब के नाम पर बेशक होती आज
भी लड़ाई है,
पर यह ना भूलना कभी कि हमने ज़िंदगी हमारी
एक ही माँ से पाई है।
दया, करुणा, आदर और सम्मान जैसी कितनी
रीतियाँ भारत ने दुनिया को सिखाई हैं,
साहित्य हो या विज्ञान, हमने हर क्षेत्र
में पहचान बनाई है।
चाँद पर जाकर भारत ने प्रतिभा अपनी
सारी दुनिया को दिखाई है,
अनेकताओं में भी एकता की परिभाषा
भारत ने दुनिया को सिखाई है।
सीने से लगाकर, दुश्मन से बचाकर
रखनी ज़मीं ये हिंदुस्तान की,
यूँ ही नहीं भारत के वीरों ने
जान अपनी गँवाई है।
सात महाद्वीपों में बँटी ये
धरती पर, खुशनसीब हैं हम कि
हमने अपनी कब्र सजाने के लिए
ये माटी हिंदुस्तानी पाई है।
ये माटी हिंदुस्तानी पाई है।
हमने आज़ाद भारत के लिए खून की
नदियाँ बहाई हैं,
शहीद होने पर भी शोक न मनाती होगी माँ,
जिसके पूत ने माटी हिंदुस्तानी पाई है।
माटी हिंदुस्तानी पाई है।
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