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जंतर-मंतर की चीख

                
                                                         
                            जंतर-मंतर आज रोया था,
                                                                 
                            
हर कोना दर्द में खोया था।
सवाल लिए जो घर से निकले,
उनका सपना क्यों संजोया था?
सोनम वांगचुक आगे बढ़े,
हिमालय की आवाज़ लिए।
धरती, जंगल, नदियों का दुख,
अपने दिल का राज़ लिए।
नेहा बोरा की आँखों में,
इंक़लाब का सपना था।
आमीन अमितोज की आवाज़ में,
संविधान ही अपना था।
मनीष सीना तान खड़ा था,
सच का दीप जलाए था।
अभिजीत दीपके हर मुश्किल में,
हौसला साथ निभाए था।
मगर जो दृश्य वहाँ दिखा,
दिल का हर कोना रो पड़ा।
कई लोग घायल होकर गिरे,
हर इंसान अंदर से टूट पड़ा।
न झुकी थी उनकी नीयत,
न टूटा उनका विश्वास।
फिर भी दर्द की हर चीख ने,
भर दी आँखों में प्यास।
सोनम की पुकार अमर रहे,
नेहा का विश्वास अमर रहे।
आमीन, मनीष, अभिजीत के संग,
सच का हर एहसास अमर रहे।
लाठी चाहे जितनी बरसे,
सच को झुका न पाएगी।
हर गिरती आवाज़ किसी दिन,
इतिहास नया लिख जाएगी।
जो कल घायल होकर लौटे,
उनको मेरा प्रणाम रहे।
जो सच की राह पर अडिग रहे,
उनका ऊँचा नाम रहे।
- शिवम यादव 
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3 महीने पहले

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