"गाँव मेरा कहीं खो गया"
गाँव मेरा गाँव न रहा,
गाँव मेरा कहीं खो गया।
पीपल की छाँव उदास खड़ी,
बरगद भी जैसे रो गया।
दादा-बाबा की मीठी बातें,
वक़्त की धूल में खो गया।
चौपालों की महफ़िल बिखर गई,
हँसी का हर पल खो गया।
मोबाइल की छोटी-सी दुनिया में,
अपनों से हर कोई दूर हो गया।
न पनघट पर वो रौनक दिखती,
न खेतों में वो शोर रहा।
हर कोई शहर की राह पकड़कर,
अपने गाँव से दूर रहा ।
न खेतों में वैसी रौनक है,
न पगडंडी पर शोर रहा।
हर कोई मंज़िल की चाह में,
अपनों से ही दूर रहा।।
गाँव तो आज भी वहीं खड़ा है,
पर उसका दिल उदास है।
लोग तो लौट आते हैं कभी-कभी,
पर लौटता नहीं वो एहसास है ।
शहरों ने सबको बाँट दिया,
अपने-अपने घरों में।
दिल मिलना अब कम हो गया,
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