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बढ़ती महंगाई

                
                                                         
                            महंगाई ने ऐसा रंग दिखाया,
                                                                 
                            
हर घर का बजट है घबराया।
दाल महंगी, तेल महंगा,
सबने अपना भाव बढ़ाया।

**चीनी** भी अब भाव दिखाए,
चाय में घुलकर जेब जलाए।
कल जो चीज़ें सस्ती थीं,
आज वही आँखें दिखाए।

तेल का भाव आसमान चढ़ा,
दाल ने भी तेवर दिखलाए,
सब्ज़ी मंडी पहुँचे तो लगता—
हम सामान नहीं, बस सोना खरीदने आए।

तनख्वाह उतनी, खर्चा दुगुना,
बचत का सपना टूट रहा।
महंगाई की इस दौड़ में,
हर इंसान बस छूट रहा।

कहते हैं देश तरक्की करता,
ये बात सुनने में अच्छी है,
पर जिसके घर चूल्हा मुश्किल से जले,
उसके लिए तरक्की कितनी सच्ची है?

साहब! भाषण बाद में देना,
पहले इतना काम करो—
जिस घर में चूल्हा जलता मुश्किल,
उस घर का कुछ इंतज़ाम करो!

चीनी महंगी, जिंदगी महंगी,
महंगा हर सामान हुआ,
आम आदमी पूछ रहा है—
सस्ता आखिर अब इंसान हुआ?

 
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15 घंटे पहले

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