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अब यूँ ही जीना सीखो

                
                                                         
                            सहना सीखो, हर हाल में रहना सीखो
                                                                 
                            
देखो और सीखो, सीखो और देखो
शिकायतों का हक़ अब तुम्हें कहाँँ
सब चंगा सी कहना और सुनना सीखो

जिनकी ख़िलाफ़त का अब सोच रहे हो
सर उठाने का जो सोच रहे हो
जब पहले ही दासता क़ुबूल ली है
अब ग़ुलाम ही बने रहना सीखो

तुम्हारी जेबों का तंग होना
तुम्हारे मोहों का भंग होना
जूँ भी नहीं रेंगेगी उन पर
नज़रअंदाज़ भी अब रहना सीखो

जो लोकतंत्र कभी मज़बूत था
बुज़दिली ने देखो क्या हश्र किया इसका
व्यर्थ प्रलाप से क्या लाभ है
तुम अब यूँ ही जीना सीखो

चुनी थी सरकार क्योंकि चुनना था
ठग रहे हैं वे क्योंकि ठगना था
कुचले गए अरमानों का क्या अफ़सोस मनायें
चौराहों पर अब बेज़ार भी होना सीखो

अंधे जयघोषों से जो फ़ुर्सत मिल गई हो
अब अपनी बर्बादी का भी जश्न मनाना सीखो

मसीहा को गढ़ गढ़कर
क़सीदों को पढ़ पढ़कर
इबादत की जो आदत डाल रखी है
घुट घुटकर अब मरना सीखो

सहमना सीखो, सिसकना सीखो, दहलना सीखो, फफकना सीखो, बहुत देर हो चुकी है हज़रात,
ख़ून के घूंट अब रो रोकर पीना सीखो
-शिवम् 
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3 महीने पहले

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