आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कहाँ से लाओगे

                
                                                         
                            मंदिर तो बना लिये, निश्छल मन कहाँ से लाओगे
                                                                 
                            
धर्म जो बचा भी लिया, मर्म कहाँ से लाओगे
कूटनीति तुम्हारी अब दुर्गन्ध मारने लगी है
चाटुकार जो पाल रखे हैं, तो सच कहाँ से लाओगे

बिके हुए ईमान हैं, कोई नई बात तो नहीं
डरे हुए इंसान हैं, सच बोल भी दें पर किसी का साथ नहीं
ख़बर देने चौथा स्तम्भ अब है खोखला
अमर जो करे आक़ा को इनके, कमबख़्त वो तक़दीर कहाँ से लाओगे

चोरी तो पकड़ी गई, चोरों के उस्ताद हैं आबाद
पियादों के इस्तीफ़े नामंज़ूर, राजाजी भी बेदाग़
आवाम को ग़र कुचलते गए,
सज़दे में झुकवाने सिर कहाँ से लाओगे

भूख मिटाने दाम ले लिए, सेठों को हर काम दे दिए
सवाल दागने के हुनर को ग़द्दारी का नाम दे दिए
मंदिर में बैठा दिये हो, नफ़रत भी फैला दिए हो
पर माफ़ करे जो गुनाह तुम्हारे, वो राम कहाँ से लाओगे?
-शिवम् खरे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर