मंदिर तो बना लिये, निश्छल मन कहाँ से लाओगे
धर्म जो बचा भी लिया, मर्म कहाँ से लाओगे
कूटनीति तुम्हारी अब दुर्गन्ध मारने लगी है
चाटुकार जो पाल रखे हैं, तो सच कहाँ से लाओगे
बिके हुए ईमान हैं, कोई नई बात तो नहीं
डरे हुए इंसान हैं, सच बोल भी दें पर किसी का साथ नहीं
ख़बर देने चौथा स्तम्भ अब है खोखला
अमर जो करे आक़ा को इनके, कमबख़्त वो तक़दीर कहाँ से लाओगे
चोरी तो पकड़ी गई, चोरों के उस्ताद हैं आबाद
पियादों के इस्तीफ़े नामंज़ूर, राजाजी भी बेदाग़
आवाम को ग़र कुचलते गए,
सज़दे में झुकवाने सिर कहाँ से लाओगे
भूख मिटाने दाम ले लिए, सेठों को हर काम दे दिए
सवाल दागने के हुनर को ग़द्दारी का नाम दे दिए
मंदिर में बैठा दिये हो, नफ़रत भी फैला दिए हो
पर माफ़ करे जो गुनाह तुम्हारे, वो राम कहाँ से लाओगे?
-शिवम् खरे
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