त्यागकर वनवास अपना लौट आया धाम में मैं।
पर तुम्हारे बिन अधूरा रह गया श्रीराम मैं।
प्राणवल्लभे! इस विरह का मैं तुम्हें क्या सार दूँगा?
तुम नहीं हो पास मेरे, किस तरह त्यौहार दूँगा?
याद हैं वे दिवस मुझको, वन-सुमन चुनतीं जहाँ तुम।
पर्णकुटी के द्वार पर ही मुस्कुराती थीं जहाँ तुम।
आज सूनी वाटिका में ढूँढ़ता हूँ पग तुम्हारे,
वृक्ष तक निःशब्द होकर पूछते हैं हाल सारे।
जानकी! इस मौन को मैं किस तरह उच्चार दूँगा?
तुम नहीं हो पास मेरे, किस तरह त्यौहार दूँगा?
राजसिंहासन मिला है, पर न मन को शांति मिलती।
दीप जलते हैं भवन में, पर न जीवन-ज्योति खिलती।
लोकहित में निर्णयों का भार सिर पर ढो रहा हूँ,
राजधर्म निभा रहा हूँ, स्वयं से ही खो रहा हूँ।
देवि! इस वैभव-विहीन मन को कहाँ संसार दूँगा?
तुम नहीं हो पास मेरे, किस तरह त्यौहार दूँगा?
रात की अंतिम घड़ी में जब अयोध्या सो रही है,
एकाकी कक्ष में स्मृति तुम्हारी ही रो रही है।
पास रखकर राजमुकुट मैं तुम्हें आवाज़ देता,
उत्तराकांक्षी हृदय को मौन का उपहार देता।
प्राणप्रिये! इस प्रतीक्षा को कहाँ तक धार दूँगा?
तुम नहीं हो पास मेरे, किस तरह त्यौहार दूँगा?
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