नज़र लग जाए न घर को, हज़ारों हैं बुरी नज़रें,
यही सब सोच के ही तो, नज़र माँ ने उतारी है।
दुआओं में भीगी रहती हैं, उसकी सब रातें,
कहीं तक़दीर की ठोकर से राहें न उतारी हैं।
मिरी हर जीत पर हंसकर वो रो पड़ती है क्यूँ,
मुझे मालूम है इसमें दुआओं की किनारी है।
सिसकती धूप में जब भी सफ़र मेरा जला,
कहीं आंचल में उसकी ही ठंडी इक कतारी है।
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