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अब भी दिल चाहे तो इक संसार फिर से ढोइए।

                
                                                         
                            वेदना के गीत लिखकर क्या मिलेगा सोचिए,
                                                                 
                            
ज़ख़्म हैं गहरे तो उन पर नमक मत रौंदिए।

भूख से लड़ते हुए जब साँस रुकने लग गई,
धर्म के नारे सुलगते आग बनकर दौड़िए।

जिस धरम की नींव पर इंसान ही गिरने लगे,
उस इबादत के महल में दीप मत फिर जोड़िए।

रंग, भाषा, जातियों के जाल में उलझे हुए,
इस सदी में प्रेम को फिर से ज़रा सा बोइए।

ख़्वाब टूटा है मगर उम्मीद ज़िंदा है अभी,
अब भी दिल चाहे तो इक संसार फिर से ढोइए।

— शिवम्
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3 घंटे पहले

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