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अपने कहां अपने होते हैं

                
                                                         
                            ता उम्र हम रिश्तों की माला पिरोते हैं ,
                                                                 
                            
पर अपने कहां अपने होते हैं।
बीत गई उम्र सारी जिन्हें अपना कहते कहते ,
वो थकते नहीं हैं अब हमें पराया कहते कहते।

किस से कहूं कैसे मैं कहूं, जिन्हें दिल से अपनाया था मैंने जिनके हर जख्म पर कभी मरहम लगाया था मैंने ,
वो थकते नहीं हैं अब हमें जख्म देते देते।

जिनके हर ग़म को अपना ग़म समझ मिटाया था मैंने,
जिनकी हर आह पर दिल से आंसू बहाया था मैंने,
वो आज हंस रहे हैं मुझ पर मेरे हालातों का मजा लेते लेते ।

ये माना आज के दौर की रीत में नहीं है समर्पण ,
फिर भी अपना तन,मन,धन,हमनेंआप पर किया था अर्पण ,
लालच में पड़ कर वो अपना स्वार्थ पूर्ति कर रहे हैं, हमें स्वार्थी कहते कहते।

 
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2 महीने पहले

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