सर सर सर सर हवा चली
पूरब से मतवाली
बादल उमड़-घुमड़ चले
सबका मन तरसा
क्यों न जल बरसा
फिर काली -काली घटा छायी
दिन में अधियारां भर आई
मानो काली रात आई
चिड़िया चहकी सहसा
क्यों न जल बरसा
देख कटा जब पेड़ की शाखाएँ
हरे- हरे सब पेड़ घबराये
सोची आई कैसी बलाएँ
पेड़ों का दिल धड़का
क्यों न जल बरसा
फिर कल- कारखाने चली
जहरीली गैस आसमां मे मिली
मौसम में आई धूप की कली
सबका माथा ठनका
क्यों न जल बरसा
कड़- कड़ कड़ - कड़ बिजली कड़की
घड़ - घड़ घड़- घड़ बादल घड़की
कल- कल कल- कल नदियाँ तड़पी
आ गया है सहसा
क्यों न जल बरसा
आजा- आजा काले बादल
फैला दे तू अपना आँचल
बिखरा दे मोती से फल
बीत गया है अरसा
फिर बताओ- क्यों न जल बरसा
-शिव कुमार "त्रिवेणी "~
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X