"माटी के माथे उगता सूरज"
माटी के माथे उगता सूरज,
घाट-घाट उजियारा है,
दउरा में सिमटा बिहार,
हर मन आज हमारा है।
छठी मैया के चरणों में,
सारा जग सिर धारे है,
डूबे सूरज को भी अर्घ्य मिले—
बिहार निराला प्यारा है।
काँच की चूड़ी छन-छन बोले,
सूप बजे झनकार,
ईख खड़ी है द्वार हमारे,
महके घर-आँगन-द्वार।
गुड़ की मीठी खीर महकती,
ठेकुआ मुस्काता है,
माँ के निर्जल तप के आगे,
चाँद भी शीश झुकाता है।
माटी के माथे उगता सूरज,
घाट-घाट उजियारा है,
दउरा में सिमटा बिहार,
हर मन आज हमारा है।
नदिया के निर्मल जल में जैसे,
आसमान उतर आया,
दीपों ने जब हाथ मिलाया,
तारों ने घर पाया।
लहरों पर थरथर विश्वासों की,
एक सुनहरी रेखा है,
जिसने देखा छठ का घाट,
उसने बिहार देखा है।
डूबे सूरज को अर्घ्य देकर,
जीवन का सम्मान करें,
कल फिर आएगा उजियारा—
आज अँधेरा प्रणाम करें।
बोली चाहे मगही हो या,
मैथिली की मिठास,
भोजपुरी के स्वर में घुलती,
अंगिका की सुवास।
बज्जिका की हँसी मिलाकर,
एक सुरों का हार,
भाषाएँ भले अलग हों लेकिन,
एक हृदय बिहार।
माटी के माथे उगता सूरज,
घाट-घाट उजियारा है,
दउरा में सिमटा बिहार,
हर मन आज हमारा है।
माथे दउरा लिए बहू जब,
धीरे-धीरे आती है,
उसके पीछे पूरी पीढ़ी,
जैसे साथ में आती है।
माँ के आँचल की छाया में,
बेटी संस्कार सीखती,
गीतों की पगडंडी होकर,
एक सदी दूसरी पीढ़ी से मिलती।
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
घाट सभी का द्वार,
एक नदी में अर्घ्य चढ़ाता,
पूरा अपना बिहार।
परदेसों में रहने वाले,
जब छठी घर आते हैं,
बरसों से सूने आँगन में,
पाँव पड़े मुस्काते हैं।
दिल्ली, मुंबई, दूर विदेश से,
लौट पड़े परिवार,
माँ के हाथों के ठेकुआ में,
मिल जाता संसार।
माटी की खुशबू बुलाती है,
रिश्तों का त्योहार है,
दूर गया जो लौट के आए—
छठ वही घर-द्वार है।
संध्या का वह लाल सुनहरा,
धीरे-धीरे ढलता है,
जल में सूरज का प्रतिबिंब,
जैसे दीपक जलता है।
हाथ जुड़े हैं, आँखें नम हैं,
मन में कोई माँग नहीं,
बस इतनी-सी विनती सबकी—
घर में रहे अभाव नहीं।
जो डूब रहा, उसको भी हमने,
श्रद्धा से स्वीकारा है,
बिहार ने जीवन से सीखा—
हर अंत नया उजियारा है।
फिर भोर हुई, पूरब जागा,
लाली छाई नभ में,
जल में सोना घुलता देखा,
लोग खड़े थे सब में।
पहली किरण पड़ी जब जल पर,
जगमग हुआ संसार,
हाथ उठे तो लगा कि जैसे,
उठ गया पूरा बिहार।
जय हो छठी मैया की—
जय हो सूर्य भगवान!
अन्न बचे, जल निर्मल रहे,
खुशहाल रहे किसान।
यह केवल व्रत नहीं है,
यह पीढ़ी का विश्वास,
यह खेतों की हरियाली है,
यह माँ का उपवास।
यह नदी, नगर, गाँव, गली का,
मिलता हुआ संस्कार,
छठ नहीं केवल पर्व हमारा—
छठ स्वयं है बिहार।
माटी के माथे उगता सूरज,
घाट-घाट उजियारा है,
दउरा में सिमटा बिहार,
हर मन आज हमारा है।
डूबे सूरज को भी अर्घ्य मिले,
उगते को जयकारा है,
जिस मिट्टी ने जग को बाँधा—
वह बिहार हमारा है!
वह बिहार हमारा है!!
वह बिहार हमारा है!!!
-शीतल राज 'किशोर'
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