दीवारों से टिक कर खड़ा एक साया,
सोचता है क्या पाया क्या गँवाया?
अंधेरे की एक लंबी ख़ामोश दीवार पर,
रोशनी ने जब अपना पहला सवाल उठाया।
मशालें लेकर जो निकले थे जग जीतने,
वे अपने ही साए से डरकर लौट आए,
जो चुपचाप घोर अंधेरे में उतरते गए,
वे अपने भीतर का सूरज खोज लाए।
नीली रेखा सी बहती है एक चेतना,
जो बताती है सीमा और असीम का भेद,
जब रोशनी बुझती है बाहर की दुनिया की,
तब मिटता है अंतरात्मा का सारा खेद।
अंधकार में जो खो गया वही पा सका,
प्रकाश की उस परम निरंजना को...
मिटकर ही जान पाया कोई पथिक,
शून्य से अनंत की इस संरचना को।
- अमन कुमार
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