जीवन की तो ये ही परिभाषा
खुद ही दस्तक खुद ही दरवाजा ।
खुद ही राह खुद ही रहगुज़र
खुद ही तो मंजिल की आवाज़ा ।
खुद ही तूफ़ां, खुद ही कश्ती,
खुद ही साहिल की अंदाज़ा।
खुद ही लम्हां खुद ही जीना
खुद ही आखिर में क़ज़ा ।
हलदौना ,क्यों ढूँढे तू औरों को,
खुद ही बंदा, खुद ही तू रज़ा ।
-शैलेंद्र शुक्ला "हलदौना"
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