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ग़मख़्वार

                
                                                         
                            हम तो ख़ुद को उनका वफ़ादार समझते रहे,
                                                                 
                            
वो हमें महज़ एक गुनहगार समझते रहे।

क़ीमत चुकाता रहा अपने इश्क़ की मैं यहाँ
फ़िर भी वो हमें महज़ ख़रीदार समझते रहे।

अब तो बिल्कुल ख़ाली हो गया हूं भीतर से,
फ़िर भी वो मुझे हरदम ख़बरदार समझते रहे।

अब तो फ़ासला है सामने होकर भी हमारे,
फिर भी हम उन्हें सफ़रदार समझते रहे।

लूट कर ले गए वो सुकून दिल का 'हलदौना',
और हम उन्हें अपना ग़मख़्वार समझते रहे।
-शैलेंद्र शुक्ला "हलदौना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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