झट से उड़ गई रे....
ढील देते ही
बिल्कुल ठीक इसी कनकैया की तरह ...
कसकर पकड़नी थी
तुम भूल गए !
काटकर पटकनी थी दूसरी छत की
चंग( पतंग) की तरह....
तब दिखता जाहो-जलाल....
अब तू बगल में हट! देख मैं कैसे हर एक की
नब्ज टटोरता हूं
प्रतिपल तमाशबीनों की तालियां बटोरता हूं....
तालियां! जो हर शहजादी पतंग
गिरने पर बजती हैं
तालियां! जो अधिकाधिक ताबेदारी के
जलसे में बजती हैं ....
तालियां! जो छत पर गिरी कटी पतंग
के जीवन को नियतिवाद में
तब्दील करने पर खिलखिलाकर
हंंस रही हैं और मार रही हैं
किलकारियां उस ताज़ा बंधी खुदमुख्तार
के जन्म पर
इन प्रतिष्ठितों से इतर
जो ऊंचा उड़ने के लिए छोड़ रहे थे
इन पतंगों को -
वाह! वाह! ये नया विचार है
यह है स्वतंत्रता जो हमने दी है उसे
यथेच्छा से उड़ने के लिए
हमने उन्हें आजाद किया.....
छत पर खड़ी पगलेट ठहाका
लगाकर हंस पड़ती है
झूठे हो... सब भ्रम है कह
अड़ पड़ती है -
" हहह... हहह..
साधन है ... साधन....
तुम्हे नहीं पता... मनोरंजन का..."
कालिख पोत कहती मुख पर नेत्रांजन का..
झटक पतंग एक निगाह से मारे
उसने पाँच तमाचे
छिटक रहा था सब तर्कों को
दुबकाकर अन्दर के सांचे....
न ज्ञात किसी की कहती जाती -
" ऊंचे नभ में उड़ने वाली धागे
से बंधी शहजादी....
गढ़ी-आजादी से इतर सब मना है
ढककर मुंह पर हस्त
सच बोलना मना है... मना है।"
पगलेट रानी भागती जाती।
- शीतल
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