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मेरी बहन, मेरा स्वाभिमान

                
                                                         
                            शांत बहती नदी-सी, गहरा तुम्हारा मन,
                                                                 
                            
तुम्हारे होने से ही, महके मेरा जीवन।
मैं बातें कहता जाऊँ, तुम धीरज से सुनो,
मेरी उलझी सोच से, तुम सुकून के धागे बुनो।
दुनिया तो शोर मचाती, अनसुना कर जाती है,
पर तुम्हारी यह शांति, हर उलझन सुलझाती है।
जब-जब राहों में मुझको, एक साए की आस हुई,
मेरी हिम्मत बनकर तुम, हमेशा मेरे पास हुई।
आँखें भले न देख पाएँ, रूप तुम्हारा कैसा है,
पर छूकर महसूस किया है, स्पर्श तुम्हारा माँ जैसा है।
दुनिया तो रंग देखती होगी, मैंने तेरी आवाज़ सुनी,
उस मीठी-सी आहट में ही, मैंने अपनी हर उम्मीद बुनी।
थामे हाथ जब साथ चलती हो, लगता है सब पा लिया,
मेरी आँखों की हर कमी को, तेरे प्यार ने मिटा दिया।
दुनिया के लिए जो रंग-रूप है, मेरे लिए वो तेरा नाम है,
तेरे होने से ही बहन, मेरी हर सुबह और शाम है।
राखी का रेशम-धागा, इंसानों का विश्वास—
जहाँ न कोई शर्त-स्वार्थ, बस अपनों का साथ।
रक्त-संबंधों से परे, यह दिलों का नाता है,
बंद आँखों से भी मुझको, बस तेरा ही चेहरा नज़र आता है।
तुम सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं, मेरी ताक़त और मान हो,
इस सीधी-सच्ची दुनिया में, तुम ही मेरा स्वाभिमान हो।
बना रहे यह पावन साथ, जब तक इस सीने में साँस रहे,
भाई-बहन का यह सुंदर बंधन, ताउम्र ही ख़ास रहे।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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