अंधेरा एक कमरे की तरह था,
जिसमें कोई दरवाजा नहीं था।
मैं बहुत देर तक उसी कमरे में बैठा रहा।
लोग बाहर से आते और कहते—
"यह बेचारा है, इसके पास आँखें नहीं हैं।"
वे मुझे दया देते थे,
जैसे कोई पुरानी कमीज़ किसी को दे देता है,
जिसका रंग उड़ गया हो।
मैं सोचता था कि आँखें न होना
क्या किसी चीज़ का न होना है?
जैसे पेड़ से एक पत्ता गिर जाए,
तो क्या पेड़ नहीं रहता?
मैं भी था,
पर लोग मुझे केवल मेरी न होने वाली आँखों से देखते थे।
फिर सूरदास आए,
उन्होंने बिना देखे एक ऐसा रूप देखा,
जिसे देखने के लिए लोगों को आँखें साफ़ करनी पड़ती थीं।
फिर भी दुनिया बहुत बड़ी थी
और मेरा कोना बहुत छोटा,
मैं कोने में बैठकर अपनी ही साँसों की गिनती करता था।
एक दिन छह बिंदु आए,
वे बहुत छोटे थे,
जैसे कागज़ पर उगे हुए छोटे-छोटे अंकुर।
मैंने उन्हें अपनी उंगलियों से छुआ,
छूते ही बिंदु शब्द बन गए,
शब्दों से पेड़ बने, नदियाँ बनीं, और एक पूरा घर बन गया।
लुई ब्रेल ने मुझे एक चश्मा दिया था,
जो आँखों पर नहीं, उंगलियों पर पहना जाता था।
अब मैं चलता हूँ,
तो एक छोटी-सी छड़ी मेरे आगे-आगे चलती है,
वह रास्ते से पूछती है—"क्या यहाँ कोई गड्ढा है?"
और रास्ता सच-सच बता देता है।
फोन के भीतर एक छोटी-सी आवाज़ रहती है,
जो बहुत जल्दी-जल्दी बोलती है,
वह मुझे बताती है कि दुनिया में क्या चल रहा है।
मैं उंगली दबाता हूँ,
और पूरी किताब मेरे कानों में बहने लगती है।
लोग कहते हैं—"तुम देख नहीं सकते।"
मैं कहता हूँ—"मैं सुन सकता हूँ, छू सकता हूँ, और सोच सकता हूँ।"
देखना ही सब कुछ तो नहीं होता,
पर जब मैं सड़क पार करता हूँ,
तो गाड़ियाँ बहुत तेज़ चलती हैं,
उन्हें नहीं पता कि मेरी छड़ी क्या कह रही है,
शहर अभी पूरी तरह से मेरा दोस्त नहीं बना है।
आने वाले समय में
अंधेरा कमरा नहीं रहेगा,
वह एक खुली खिड़की बन जाएगा।
एक छोटी-सी मशीन होगी,
जो मेरी आँखों के पास बैठकर मुझे बताएगी—
"सामने एक चिड़िया उड़ रही है,
और उसका रंग हरा है।"
पर मुझे रंग की चिंता नहीं है,
मुझे चिंता इस बात की है कि
क्या लोग मुझे बिना दया के देख पाएंगे?
भविष्य वह दिन होगा,
जब कोई मुझे 'दृष्टिहीन' कहकर अलग से याद नहीं रखेगा,
सब लोग एक साथ बैठेंगे,
और जो देख सकता है वह भी,
और जो नहीं देख सकता वह भी—
दोनों एक ही धूप में हाथ सेकेंगे।
उजाला आँखों में नहीं होता,
उजाला तो वहाँ होता है जहाँ जगह होती है—
सबके लिए थोड़ी-थोड़ी जगह।
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