थोड़ी तो तरस खा ऐ ज़िंदगी मुझ पर,
क्यों दर्द पे दर्द दिए जा रही है।
मैं टूटकर बिखर जाऊँगा,
क्यों मुझको इतना सता रही है।
बस कर ऐ ज़िंदगी,
अब बहोत हो गया।
मंज़िल तक पहुँच जाने दे,
क्यों मुझको बीच मँझधार में ही डुबा रही है।
-तनवीर
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