कौन है तू?
कभी बैठ अकेले में भी तू
कभी खुद से भी तू बातें कर
मन से दिन की चंचलता छोड़
नीरव एकांत तू रातें कर
तब तोल पाएगा खुद को तू
पानी कितना? कितने में तू?
कभी बैठ अकेले में भी तू
कभी खुद से भी तू बातें कर
अरे! भूल गया है खुद को तू
बंध, मोम रसीले धागों में
भाग्यवान हो फिर भी तू
क्यों खड़ा है तू अभागों में
कभी बैठ अकेले में भी तू
कभी खुद से भी तू बातें कर
अपने बल को कभी आंक भी तू
अपनी गहराई कभी माप भी तू
तट पर बैठ, क्या पाएगा?
जब तक तू, बीच न जाएगा
कभी बैठ अकेले में भी तू
कभी खुद से भी तू बातें कर
जो पाया, उसे संजोना क्या?
जो तेरा नहीं उसे खोना क्या?
कब तक तू खुद को मारेगा?
हर बार तू ही क्यों हारेगा ?
कभी बैठ अकेले में भी तू
कभी खुद से भी तू बातें कर
करना क्या है? तू कर क्या रहा?
इस बात को तू पहचान जरा
पाने की गर लिप्सा हो तो
क्यों मूक - वधिर हो चुपचाप खड़ा।
कभी बैठ अकेले में भी तू
कभी खुद से भी तू बातें कर
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