जो जीया वही बस गाता हूँ
जन-जन में खुद को पाता हूँ
मैं पीड़ा में, मैं रोदन में
जन-जन के हर उद्बोधन में
कहीं आँसू बन बस लुढ़क गया
कभी क्रोधित मन बस सिमट गया
आशा की डोरी थामे बस
उम्मीद की किरण फैलाता हूँ
जो जीया वही बस गाता हूँ
जन-जन में खुद को पाता हूँ
रखता हूँ सीमित, संतोखी मन
खुद को खुद से छल जाता हूँ
जब-जब तन्हा महसूस किया
खुद को खुद से बहलाता हूँ
देखा न स्वप्न साकार कभी
बेबस, बिलख सो जाता हूँ
जो जीया वही बस गाता हूँ
जन-जन में खुद को पाता हूँ
आकार भी हूँ, बेकार भी हूँ
उन्नत समाज पर प्रहार भी हूँ
आज़ादी के शीश महल समक्ष
खुले आकाश सो जाता हूँ
होकर समाज का रीढ़, पर
हाथ जोड़ गोहराता हूँ
जो जीया वही बस गाता हूँ
जन-जन में खुद को पाता हूँ
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