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किंतु न कभी मनन करते हैं,

                
                                                         
                            पूजा-पाठ हवन करते हैं,
                                                                 
                            
लेकिन साफ़ न मन करते हैं,

अनुभव की झोली है खाली,
कहते रोज़ भजन करते हैं,

संतों की वाणी भी सुनते,
किंतु न कभी मनन करते हैं,

अहंकार इतना की पल में,
सबका मान हनन करते हैं,

नदियों की पीड़ा न समझते,
जब ये रेत खनन करते हैं,

चिंता नहीं किसी की ख़ुद पे,
धरती और गगन करते हैं,

झूठ सही तारीफ़ पे 'गुंजन',
ख़ुद को आप मगन करते हैं,
--शशि भूषण मिश्र 'गुंजन'
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2 घंटे पहले

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