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चिंता

                
                                                         
                            दूसरों की हंसी लगे कांटों सी
                                                                 
                            

उनकी ख़ुशी लगे चाटों सी

मन भी न लगे किसी काम में,

रुखा-रुखा पन सा लगे सुबह शाम में

मन भी कहीं दूर जाने को कहे

और अकेले कही ओझल हो जाने को कहे

क्यों आती है मन में यह 'चिंता'

कर देती है जीवन को यह अँधा



चिंता में उड़ जाते हैं सिर के बाल

लटक जातें हैं चेहरे के गाल

टपकता है आँखों से पानी

बूढ़ी हो जाती है ये जवानी

जीवन का कर देती है सत्यानाश

इसके आगे लेना पड़ता है संन्यास

क्यों ये चिंता मन में आती है

और मुझे तड़पाती जाती है



कभी जीवन में सफलता की चिंता

तो कभी पैसो की अल्पता की चिंता

कभी काम ना मिलने की चिंता

तो कभी आराम ना मिलने की चिंता

कभी घरवालो की चिंता

तो कभी समाज वालो की चिंता

जीवन में तो हर जगह है यह चिंता

पता नहीं कौन सी वजह है यह चिंता


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6 वर्ष पहले

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