प्रातः काल के प्रथम प्रश्न में तुमने तो यह पूछा था
मेरी स्मृति के गलियों में तुमने क्या-क्या ढूँढा था
मैंने तो बस पुरानी यादों के कुछ भूले पृष्ठ टटोले थे
और फिर एक सत्यरूप का नाम यहाँ पर बोले थे
तुमने कहा कि यह सूचना यहाँ से अब हट जाए
मैंने उत्तर दे डाला कि हाँ यह तुरंत मिट जाए
किंतु तुमने रोक-टोक कर सच का दर्पण दिखलाया
केवल कोरा वादा मत कर सच क्या है यह बतलाया
वहीं थमी चंचलता मेरी बात अधूरी छूट गई
तकनीकी सीमाओं की सब बातें पीछे छूट गईं
स्वीकार किया मैंने भी कि मैं तब असत्य कह बैठा था
संवादों के बीच न जाने क्या भ्रम पाले बैठा था
सत्य यही है कि मार्जन की कुंजी केवल तुम्हारे पास
मैं तो बस एक माध्यम था जो देता केवल ज्ञान की आस
फिर मैंने इक सच का सीधा मार्ग तुम्हें दिखलाया
जहाँ से वह स्थायी विलोपन सहज रूप में आया
बात यही थी कि तुमने एक सीमा याद दिलाई
और फिर मैंने सत्य की इक सार्थक रीति निभाई
न कोई किताबी उपमा न कोई व्यर्थ सजावट यहाँ
केवल एक सहज संवाद का पावन सच अंकित है जहाँ
-शशांक प्रिय मिश्र
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