घड़ी की सुइयों के साथ
जब मस्तिष्क थकती है
परीक्षा कक्ष की बातें फिर
आँखों में क्यों जगती है
तीन घंटे का इक सफर
ज्ञान का कुछ ताना-बाना
लगता है जैसे अल्प समय में
है एक नया शहर बसाना
-शशांक प्रिय मिश्र
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