यदि जीवन एक चित्र होता, विधि की तूलिका रंग भरती।
सुख-दुःख की रेखाओं में भी, अनहद रागिनी नित निखरती॥
आशा के अरुणिम अम्बर पर, विश्वास-इन्द्रधनुष लहराता।
हर अश्रु मोती बन झिलमिलाता, हर संताप चन्दन बन मुस्काता॥
अंतर्मन का श्वेत कैनवास, ब्रह्म-प्रकाश से स्वयं दमकता।
चित्र नहीं—चिर-सत्य का दर्शन, जीवन मौन गीत-सा झरता॥
- सनातन मुकुंद
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