वृषारूढ़ा अम्बे, धैर्य-धर्म की ज्योति जगातीं,
शैलशिखर से अंतर्मन तक, शिव-संकल्प जगातीं।
हिमगिरि की नीरवता में, तप का शाश्वत नाद सुनातीं,
मूल प्रकृति के कण-कण में, ब्रह्मचेतना बरसातीं॥
वृष के दृढ़ पदचापों में, संयम के स्वर झंकृत होते,
त्रिशूल-तेज से तम के दुर्ग, क्षण में ध्वस्त होते।
श्वेत वसन की आभा में, निर्मल अंतःकरण निखरता,
मातृकृपा के स्पर्श से, सुप्त पुरुषार्थ पुनः सँवरता॥
वृषारूढ़ा! मन-वृष को, विवेक-वल्गा से साधें हम,
वासना के दुर्गम वन से, आत्मप्रकाश तक बढ़ें हम।
स्थिरता में गति खोजें, मौन-साधना में स्वर पाएँ,
मिट्टी के इस घट में, चिरंतन आकाश जगाएँ॥
नमन तुम्हें हे शैलसुते, श्रद्धा का पावन आधार,
तुमसे ही संकल्प पवित्र, तुमसे जीवन में उजियार।
अंतस के कैलास पर, ज्ञान-सुधा बरसाती रहना,
जीवभाव से ब्रह्मभाव तक, माँ! पथ दिखलाती रहना॥
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X