छेनी-हथौड़े के अधिपति, विश्वकर्मा को नमन है,
सूत्र-माप के दिव्य विधाता, विश्वकर्मा को वंदन है।
रेखा खींचें, कोण सँवारें, पाषाणों पर रूप गढ़ें,
आरी-रंदे की लय साधकर, काष्ठों में आकार गढ़ें।
धौंकनी धधके, भट्ठी तपे, निहाई पर धातु ढले,
घन-चोटों से तप्त धातु, मनचाहे आकार ढले।
कसौटी पर धातु परखें, मापदंड से दोष हटाएँ,
करघे पर तंतु-सूत्र साधकर, पट सुंदर बुन जाएँ।
छेनी बोले, घन झंकारे, रंदा काष्ठ सँवारे,
कर-कौशल से विश्वकर्मा, शिल्प निखारे।
हे शिल्पेश्वर! हाथ सँवारें, कर्म बने शुभ आराधन,
औजारों के पुष्प चढ़ाकर, अर्पित तन-मन-वंदन।
- सनातन मुकुंद
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