शिल्प-सृष्टि के दिव्य विधाता, विश्वकर्मा को नमन है,
कर्म-कौशल के पुण्य प्रभाकर, विश्वकर्मा वंदन है।
शून्य धरा पर रूप सँवारें, जड़ में चेतन-भाव भरें,
पाषाणों में प्राण जगाकर, नव-सृजन के स्वप्न धरें।
सृजन-साधना के आराध्य, श्रम जिनका अभिनंदन है,
कर्म-कौशल के पुण्य प्रभाकर, विश्वकर्मा वंदन है।
धातु गलाकर रूप निखारें, यंत्रों में संचार भरें,
सूने पथ को सेतु बनाकर, जीवन में विस्तार भरें।
कर्मभूमि के दिव्य शिल्पी, कौशल जिनका चंदन है,
कर्म-कौशल के पुण्य प्रभाकर, विश्वकर्मा वंदन है।
माप-मान में सूक्ष्म विवेक, रेखाओं में ज्ञान रहे,
हर निर्माण-कर्म के भीतर, मंगल का विज्ञान रहे।
बुद्धि, कला, विज्ञान के स्वामी, सृजन आपका स्पंदन है,
कर्म-कौशल के पुण्य प्रभाकर, विश्वकर्मा वंदन है।
श्रमिकों के श्रम में बसकर, श्रम की गरिमा आप बढ़ाएँ,
कारीगर के कुशल करों में, नव-संभावनाएँ जगाएँ।
श्रम जहाँ सम्मानित होता, वहीं आपका अभिनंदन है,
कर्म-कौशल के पुण्य प्रभाकर, विश्वकर्मा वंदन है।
हाथ हमारे कर्मठ हों प्रभु, मन निर्मल और दृष्टि प्रखर,
कर्म बने आराधन अपना, जीवन हो मंगलमय सुंदर।
निष्ठा, श्रम, संयम की धारा, जीवन का अनुशासन है,
कर्म-कौशल के पुण्य प्रभाकर, विश्वकर्मा वंदन है।
जड़ता के तम को हर लेना, चेतनता की ज्योति जलाना,
नव-सृजन के पथ पर हमको, सत्य-निष्ठ होकर बढ़ जाना।
कौशल जब सद्कर्मों से जुड़ता, तब जीवन पावन है,
कर्म-कौशल के पुण्य प्रभाकर, विश्वकर्मा वंदन है।
उद्योगों में सिद्धि बरसाएँ, शिल्पालय मंगलमय हों,
कर्मठ हाथों के पुरुषार्थों से, जन-जीवन सुखमय हों।
विश्व-विन्यास के दिव्य नियंता, चरणों में शत-अर्चन है,
कर्म-कौशल के पुण्य प्रभाकर, विश्वकर्मा वंदन है।
जयंती की पावन बेला में, दीप श्रद्धा के जलते हैं,
श्रम-सृजन के पुण्य-पथों पर, नव-संकल्प हमारे पलते हैं।
हे देव शिल्पी! स्वीकारें यह, श्रद्धा-सुमनों का अर्पण है,
कर्म-कौशल के पुण्य प्रभाकर, विश्वकर्मा वंदन है।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X