प्रथम प्रणव की ध्वनि जागी, मंगलमय हुआ आँगन,
बुद्धि-विवेक लिए विघ्नहर्ता, आए लेकर शुभ-चंदन।
अंतर के तम-पथ पर उतरी, ज्ञान-ज्योति की उजियाली,
मंगल-मूर्ति के चरण पड़े तो, खिल उठी चेतन-हरियाली।
एकदंत के एकाग्र तप में, सत्य-साधना का स्वर है,
विशाल मस्तक कहता जग से, चिंतन ही जीवन का वर है।
सूक्ष्म दृष्टि से मूषक-मन को, संयम का संदेश मिला,
जहाँ विवेक का दीप जला, वहाँ विघ्नों का तम पिघला।
अक्षर-अक्षर में जागी फिर, भारत की अमिट कहानी,
माटी की गंध लिए आई, जन-जन की अपनी वाणी।
लोक-स्मृति से वेद-ध्वनि तक, जिसकी निर्मल धारा है,
हिंदी केवल भाषा नहीं, भारत की सांस्कृतिक वाणी है।
देवनागरी के दीप जले तो, भावों ने आकार लिया,
शब्दों ने संवेदना पाई, मन ने अपना स्वर पा लिया।
करुणा, श्रम, उत्सर्ग, समर्पण, सबका इसमें मान रहे,
भारत के बहुरंगी मन में, हिंदी का सम्मान रहे।
जब गणपति की बुद्धि मिले और, हिंदी की वाणी हो,
तब अक्षर केवल अक्षर न हों, उनमें जीवन-कहानी हो।
ज्ञान बने जन-जन की निधि और, सत्य बने उच्चारण में,
विवेक विराजे विचारों में, संस्कृति हो आचरण में।
आओ आज प्रणाम करें हम, बुद्धि, वाणी, संस्कारों को,
मंगलमय कर दें अपने मन के, सुप्त हुए उद्गारों को।
विघ्नहर्ता शुभ-बुद्धि दें, हिंदी दे अभिव्यक्ति-धन,
गणनायक का हो अभिनंदन, हिंदी का हो अभिनंदन।
- सनातन मुकुंद
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