माता-सी धरती रोती, सुनो! मानव-तनय पुकार।
संयम-दीप जलाओ, त्यागो लोभ-मोह के विकार॥
वन-प्रकृति के श्वास बचाओ, निर्मल हों जलधार।
सीमित भोग, करुणा-पथ अपनाओ, यही जीवन-आधार॥
शिक्षा-ज्योति जगाओ, जागे जन-जन का शुभ विवेक।
'वसुधैव-कुटुम्बकम्' का स्वर, गुंजित हो कर्म अनेक॥
मेघ-सुधा का मान रखो, सूख न जाए जीवन-धार।
बीज बचाओ, भू सींचो, फूले धरा हरित विहार॥
श्रम की गाथा गूँजे घर-घर, जागे सेवा-सत्कार।
मिलकर रचें सह-अस्तित्व, हो स्नेह-संयम का संसार॥
बाल-हृदय में रोपें हम, प्रकृति-प्रेम के शुभ विचार।
करुणा, मैत्री, सत्य-व्रतों से, दीप्त हो मानव-व्यवहार॥
जब जन-मन में जागेगी, कर्तव्य-दीपक की झंकार।
तब मुस्काकर कहेगी धरा—'धन्य हुआ निज परिवार'॥
मर्यादित उपभोग हो जब, हँस उठे धरणी-संसार।
संयम-सुर में गाए मानव, शांति-सुहागिन नव विहार॥
-सनातन मुकुंद
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