तुम्हारे होने से रजनी, तारक-दीप सजाती है,
मौन दिशाओं की वीणा, अनहद राग सुनाती है।
तुम्हारे होने से तृषित मरु में, सावन-मेघ घिर आता है,
सुप्त चेतना का कण-कण, नव-स्पंदन से भर जाता है।
तुम्हारे होने से पथ भी, अंतर्मुखी हो जाता है,
हर पदचाप अंतस में, अगम द्वार खुलाता है।
तुम्हारे होने से ‘मैं’ का, आवरण स्वयं गलता है—
‘मैं’ मिटते ही जाना—जो खोजा, वह मैं ही था।
- सनातन मुकुंद
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