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तू है, बस तू ही तो है : वात्सल्य-प्रधान गीत

                
                                                         
                            तू ही मेरी साँसों में,
                                                                 
                            
तू ही मेरे प्राण।
तेरी हँसी में बसता है,
मेरा सारा जहान॥

कल तक तुझ पर प्राण लुटाता,
आज तुझे पुकारूँ मैं।
तेरी राह निहारूँ मैं,
खुद को भी बिसराऊँ मैं॥

जब भी तू बिखरा-सा मिले,
मन में पीर छिपाए।
तेरी आँखों के आँसू,
मुझसे देखे न जाएँ॥

खींच तुझे बाँहों में भर लूँ,
माथे पर चुम्बन धर दूँ।
तेरे मन की सारी पीड़ा,
अपने मन में भर लूँ॥

तेरे काँपते अधरों पर,
फिर से हँसी सजाऊँ।
तेरी बुझती आशाओं में,
नव विश्वास जगाऊँ॥

तू मत डर, मैं साथ हूँ तेरे,
हर संकट, हर राह।
तेरी नैया पार लगाऊँ,
बनकर तेरी पतवार॥

तेरी हँसी मेरी पूजा,
तेरा सुख आराधन।
तेरे मन का खिलना ही तो,
मेरे जीवन का चन्दन॥

जब तक तेरी आँखों में,
दुःख की बदली छाई।
जब तक तेरे अधरों पर,
हँसी न लौटकर आई॥

तब तक चैन न आए मुझको,
तब तक कहाँ विश्राम।
तेरी मुस्कान ही तो है,
मेरा सुख, मेरा धाम॥

तू ही मेरी साँसों में,
तू ही मेरे प्राण।
तेरी हँसी में बसता है,
मेरा सारा जहान॥
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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