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सुकून : दार्शनिक दोहावली

                
                                                         
                            मौन-दीप अंतस जले, मिटे विकल संताप।
                                                                 
                            
सुकून मिले जिस मन को, जहाँ टले अभिशाप॥

तृष्णा की जब धूल सब, धो दे निर्मल प्रीति।
अंतर में तब खिल उठे, शाश्वत सुख की रीति॥

बाहर ढूँढ़े जग जिसे, भीतर उसका धाम।
स्वयं मिला जो आत्म से, मिला सुकून तमाम॥

क्षीण हों जब इच्छाएँ, मिट जाए अभिमान।
तब मुस्काता मौन ही, बन जीवन-वरदान॥
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

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