मौन-मंदिर में कहीं, शांति-दीप जलता है,
अंतर-आकाश में मौन, चाँद उतरता है।
थके हुए पथिक के मन का, मधुर विश्राम है,
जीवन-वीणा के तारों का, कोमल विराम है।
चिंताओं के गहन तम में, चिद्-रश्मि मुस्काती,
आशा की अंजलि भरकर, प्राणों को सहलाती।
न शब्दों की चाह यहाँ, न स्वप्नों का भार,
निःश्वासों में बहता है, अनहद का संसार।
अहं के आवरण झरे, आत्मा जब नहाए,
सुकून वही अमृत है, जो भीतर से आए।
क्षण-क्षण में जो मिल जाए, परमात्मा का स्पर्श,
वही शांति का संगीत है, वही जीवन का हर्ष।
- सनातन मुकुंद
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