श्वासों की सरगम में कौन, अनहद राग सुनाता है?
मौन हृदय की वीणा पर, कौन स्वयं को गाता है?
आती श्वास प्रभु-नाम कहे, जाती श्वास सिखाती है,
क्षणभंगुर देह-द्वार पर, शाश्वत ज्योति जगाती है।
प्राण-पवन की लहर में, किसका स्पंदन पलता है?
अंतर के निस्तब्ध गगन में, कौन निरंतर चलता है?
एक श्वास में जन्म छिपा है, एक श्वास में मरण,
दोनों के संधि-बिंदु पर ही, होता सत्य-दर्शन।
श्वास-श्वास जब मंत्र बने तो, नाद स्वयं बन जाता है,
मन का तम जब गलता जाता, अंतर-सूर्य उगाता है।
बाहर जिसको जगत खोजता, भीतर वही समाया है,
कण-कण के मौन कंठ में, उसी ने स्वर भराया है।
जब ‘मैं’ का अंतिम स्वर मिटता, ‘वह’ का नाद उभरता है,
बूँद स्वयं को भूल सिंधु में, अपना सत्य सँवरता है।
सुमिरन जब इतना गहरा हो, शब्द सभी खो जाते हैं,
श्वासों के सूक्ष्म मौन तले, केवल प्राण रह जाते हैं।
आत्मा जहाँ परमात्मा से, अपना भेद भुलाती है,
जीव की बुझी हुई लौ, शिव-ज्योति बन जाती है।
श्वास नहीं तब केवल श्वासें, चैतन्य-तरंगें होती हैं,
मौन गगन के मध्य अनाहत, नाद-धाराएँ बहती हैं।
श्वासों का यह सूक्ष्म सुमिरन, अंतस-द्वार खोलता है,
जिसे बाहर खोजा जीवन भर, भीतर आकर बोलता है।
अंतिम श्वास नहीं अंत यहाँ, यह अमृत-प्रभात है,
श्वासों के सुमिरन के भीतर, आत्मा का साक्षात् है।
- सनातन मुकुंद
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