आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

श्वासों का यह सूक्ष्म सुमिरन, अंतस-द्वार खोलता है,

                
                                                         
                            श्वासों की सरगम में कौन, अनहद राग सुनाता है?
                                                                 
                            
मौन हृदय की वीणा पर, कौन स्वयं को गाता है?

आती श्वास प्रभु-नाम कहे, जाती श्वास सिखाती है,
क्षणभंगुर देह-द्वार पर, शाश्वत ज्योति जगाती है।

प्राण-पवन की लहर में, किसका स्पंदन पलता है?
अंतर के निस्तब्ध गगन में, कौन निरंतर चलता है?

एक श्वास में जन्म छिपा है, एक श्वास में मरण,
दोनों के संधि-बिंदु पर ही, होता सत्य-दर्शन।

श्वास-श्वास जब मंत्र बने तो, नाद स्वयं बन जाता है,
मन का तम जब गलता जाता, अंतर-सूर्य उगाता है।

बाहर जिसको जगत खोजता, भीतर वही समाया है,
कण-कण के मौन कंठ में, उसी ने स्वर भराया है।

जब ‘मैं’ का अंतिम स्वर मिटता, ‘वह’ का नाद उभरता है,
बूँद स्वयं को भूल सिंधु में, अपना सत्य सँवरता है।

सुमिरन जब इतना गहरा हो, शब्द सभी खो जाते हैं,
श्वासों के सूक्ष्म मौन तले, केवल प्राण रह जाते हैं।

आत्मा जहाँ परमात्मा से, अपना भेद भुलाती है,
जीव की बुझी हुई लौ, शिव-ज्योति बन जाती है।

श्वास नहीं तब केवल श्वासें, चैतन्य-तरंगें होती हैं,
मौन गगन के मध्य अनाहत, नाद-धाराएँ बहती हैं।

श्वासों का यह सूक्ष्म सुमिरन, अंतस-द्वार खोलता है,
जिसे बाहर खोजा जीवन भर, भीतर आकर बोलता है।

अंतिम श्वास नहीं अंत यहाँ, यह अमृत-प्रभात है,
श्वासों के सुमिरन के भीतर, आत्मा का साक्षात् है।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर