वक्रतुण्ड विनायक आओ, मंगल-दीप जलाओ,
मेरे मन-मंदिर में बप्पा, ज्ञान-ज्योति बरसाओ।
गणपति बप्पा मोरया, विघ्न-विनाशक मोरया,
शरण तुम्हारी जो भी आए, मंगलमय हो जाए।
मूषक मन की चंचलता को, चरणों में विश्राम दो,
मोह-मद-अहंकार मिटाकर, निर्मल अंतर-धाम दो।
बुद्धि-कमल पर बैठ विराजो, विवेक-सुधा बरसाओ,
मेरे मन-मंदिर में बप्पा, ज्ञान-ज्योति बरसाओ।
गणपति बप्पा मोरया, विघ्न-विनाशक मोरया,
शरण तुम्हारी जो भी आए, मंगलमय हो जाए।
एकदंत हे करुणासागर, करुणा-दृष्टि निहारो,
अंतर-वीणा के स्वरों में, अपना नाद उतारो।
शब्द हमारे सत्य-सुगंधित, कर्म हमारे पूजा हों,
जीवन की हर श्वास तुम्हारी, चरणों में अर्चना हो।
रिक्त हृदय में प्रेम जगाकर, अंतर-तम हर जाओ,
मेरे मन-मंदिर में बप्पा, ज्ञान-ज्योति बरसाओ।
गणपति बप्पा मोरया, विघ्न-विनाशक मोरया,
शरण तुम्हारी जो भी आए, मंगलमय हो जाए।
ऋद्धि-सिद्धि के संग विराजो, शुभता-द्वार खोलो,
भाग्य नहीं, पुरुषार्थ जगाकर, जीवन-पथ पर चलाओ।
जहाँ निराशा रात बने तो, आशा-चंद्र खिलाओ,
जहाँ भटकता मन हो बप्पा, सत्य-पथिक बनाओ।
अंतर के हर विघ्न-वृक्ष को, मूल सहित कटवाओ,
मेरे मन-मंदिर में बप्पा, ज्ञान-ज्योति बरसाओ।
गणपति बप्पा मोरया, विघ्न-विनाशक मोरया,
शरण तुम्हारी जो भी आए, मंगलमय हो जाए।
अंतिम श्वास तक नाम तुम्हारा, अधरों पर मुसकाए,
अंतर का यह दीप तुम्हारे, चरणों में जलता जाए।
मैं मिट जाऊँ, भाव न मिटे, तुमसे नाता रहे,
तन-माटी हो जाए चाहे, मन में गणपति गाता रहे।
हे मंगलमूर्ति, हे विघ्नहर्ता, अपना धाम बसाओ,
मेरे मन-मंदिर में बप्पा, ज्ञान-ज्योति बरसाओ।
गणपति बप्पा मोरया,
मंगलमूर्ति मोरया।
विघ्न-विनाशक मोरया,
सिद्धिविनायक मोरया।
- सनातन मुकुंद
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