प्रणव-प्रभा बन प्राण-पटों पर, शिव! तुम चिदाकाश उकेरते।
मौन-महासागर की लहरों में, आत्मज्योति के दीप घने धरते॥
जटाओं की गंगा मात्र जल नहीं, ब्रह्मविद्या की निर्मल धारा।
बूँद-बूँद में ऋत का स्पंदन, जागे अंतर का कैलाश सारा॥
शशिधर! तेरी शीतल किरणें, अहं-अग्नि स्वयं बुझातीं।
चन्द्रकला बन अंतर्मन में, प्रज्ञा की नव ऋतु बरसातीं॥
नीलकण्ठ! कालकूट पिया तुमने, जग-संताप स्वयं हर लिया।
करुणासुधा बरसाकर जग पर, जीवन-पथ आलोकित किया॥
डमरू का अनाहत कम्पन, वेदों का प्रथम उद्गम गाता।
नाद-ब्रह्म का सूक्ष्म स्पंदन, कण-कण में शिवत्व जगाता॥
त्रिनयन-ज्योति प्रज्वलित हो, त्रिकाल स्वयं विस्मित रह जाए।
ज्ञानाग्नि के दिव्य प्रभंजन में, मिथ्या का अंधकार बह जाए॥
भस्म-विभूति मौन सुनाती—"क्षणभंगुर देहाभिमान।"
शिव-स्मृति ही नित्य चैतन्य, शेष जगत् स्वप्न-समान॥
नागाभरण समय का बंधन, चरणों में निस्पंद पड़ा है।
काल स्वयं जिसके सम्मुख झुके, वही महाकाल खड़ा है॥
कैलाश कहीं पर्वत भर नहीं, निर्मल अन्तर्चेतन का द्वार।
जहाँ समाधि बन श्वास ठहरती, वहीं प्रकटे शिव साकार॥
बिल्वपत्र बन भाव समर्पित, प्रेमामृत का हो अभिषेक।
"ॐ नमः शिवाय" जपे अंतर, मिटे अविद्याभिलेख॥
"तत्त्वमसि" मौन महावाक्य, शम्भो! तुममें ही भासित।
जीव-ब्रह्मैक्य स्वयं प्रकटे, चिदानन्द-स्वरूप प्रतिष्ठित॥
न याचूँ स्वर्ग, न सिद्धि, न ऋद्धि, न क्षणिक सुख-विलास।
बस इतना वर दो, हे शम्भो—शिवमय हो मेरी हर श्वास॥
- सनातन मुकुंद
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