हर-हर शंभू, जय गौरी माँ, गणपति मंगलकारी,
भक्ति बने जीवन की सरिता, प्रेम बने उजियारी।
कैलासों के शिखर विराजें, जट में गंगा धारे,
नीलकंठ के मौन अधर पर, वेद-मंत्र उजियारे।
गौरी के नयनों में झलके, करुणा का मधुमास,
गणपति के मंगल चरणों में, अटल रहे विश्वास।
हर-हर शंभू, जय गौरी माँ, गणपति मंगलकारी,
भक्ति बने जीवन की सरिता, प्रेम बने उजियारी।
शिव हैं तप की अग्नि अनश्वर, शक्ति सृजन की धारा,
शिव बिन शक्ति शून्य जगत है, शक्ति बिना शिव हारा।
अर्धनारीश्वर रूप सिखाता, एकत्व का ज्ञान,
दो तन होकर एक चेतना, यही प्रेम की पहचान।
हर-हर शंभू, जय गौरी माँ, गणपति मंगलकारी,
भक्ति बने जीवन की सरिता, प्रेम बने उजियारी।
माँ की ममता बनकर गौरी, गणपति को दुलरातीं,
पिता शिव के कर का आशीष, विघ्न सभी हर जातीं।
मूषक-मन को वश में करके, बुद्धि बने पतवार,
गणपति के सुमिरन से सहज ही, तर जाए संसार।
हर-हर शंभू, जय गौरी माँ, गणपति मंगलकारी,
भक्ति बने जीवन की सरिता, प्रेम बने उजियारी।
जहाँ प्रेम हो शिव-सा निर्मल, गौरी-सी हो ममता,
जहाँ विवेक गणेश-सा जागे, मिट जाए मन की व्यथा।
ऐसा हो हर घर का आँगन, ऐसा हो संसार,
विश्वासों के दीप जलें और, मिटे हृदय-अंधकार।
हर-हर शंभू, जय गौरी माँ, गणपति मंगलकारी,
भक्ति बने जीवन की सरिता, प्रेम बने उजियारी।
न धन माँगूँ, न यश माँगूँ, न माँगूँ सुख-भोग,
अंतर की सुप्त ज्योति जगा दो, हर लो तम का रोग।
शिव दें धीरज, शक्ति करुणा, गणपति बुद्धि-विवेक,
तीनों की पावन छाया में, जीवन हो अभिषेक।
हर-हर शंभू, जय गौरी माँ, गणपति मंगलकारी,
भक्ति बने जीवन की सरिता, प्रेम बने उजियारी।
जब तक श्वास रहे तन में, नाम तुम्हारा गाऊँ,
शिव में शक्ति, शक्ति में शिव को, अंतर से पहचानूँ।
माता-पिता के प्रेम में पाऊँ, ईश्वर का साकार,
गणपति के मंगल-सुमिरन से, हो भवसागर पार।
हर-हर शंभू, जय गौरी माँ, गणपति मंगलकारी,
भक्ति बने जीवन की सरिता, प्रेम बने उजियारी।
- सनातन मुकुंद
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