प्रणव-प्रभा जब प्राण पखारे, जागे चिदम्बर-ज्ञान।
शिव-भक्ति बन आत्मदीक्षा, साधना ब्रह्म-संधान॥
गंगाधर की दिव्य धारा, अंतःऋतु का विमल अभिषेक।
मलावरण विलय स्वयं हो, प्रकटे चैतन्य-ऋत-विवेक॥
डमरू का अनहद स्पंदन, नादब्रह्म का मौन प्रसाद।
श्रुति से परे जहाँ निःशब्द, वहीं उदित शिव-संवाद॥
त्रिनेत्र जगे प्रज्ञा-ज्योति बन, भस्म हो अविद्या का जाल।
'नेति-नेति' के शुद्ध पथों पर, दीप्त हो आत्मा का भाल॥
त्रिशूल नहीं केवल आयुध, त्रिविध बंध का मौन क्षय।
कर्ता–कर्म–क्रिया लय पाकर, शेष रहे शिव-चैतन्य॥
नीलकण्ठ का अमृत-व्रत है, विष को करुणा में गलना।
द्वेष-दहन को कंठ रोक ले, प्रेम-पियुष बनकर ढलना॥
भस्म-विभूति कहे प्रतिक्षण—नश्वर है अहं का विस्तार।
कण-कण में वही विराजे, जो चिद्घन, नित निराकार॥
शशिधर की शीतल प्रभा में, समाधि-सुधा का मौन प्रकाश।
चित्त-तरंगें स्वयं शमित हो जाएँ, जागे साक्षी का चिदाकाश॥
कैलास कोई भू-शिखर नहीं, निर्विकल्प अंतर का धाम।
जहाँ विलय हो 'अहं-भाव', प्रकटे स्वयं शिव का नाम॥
भक्ति न केवल पुष्पार्चन, न केवल मंत्रोच्चार।
आत्मयज्ञ में अहं-समर्पण, शिवत्व का सत्कार॥
साधक, साधन, साध्य लय हों, मिटे समस्त विकल्प-विधान।
शिवोऽहम् की चिर-अनुगूँज से, पूर्ण हो जीवनोपनिषद्-गान॥
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X