मौन-ब्रह्म की वीणा पर जब, आद्य-नाद झंकृत होता,
अक्षर-अक्षर में चिद्-अग्नि का, सूक्ष्म प्रभात उदित होता॥
शून्य-गर्भ की निस्तब्ध गुफा में, कौन अनहद गाता है?
किस सूक्ष्म तरंग-स्पन्दन से, जड़ चेतन हो जाता है?
शब्द नहीं केवल ध्वनि—अक्षर में, ब्रह्म-बीज सोया होता,
एक सत्य-स्पर्श मिलते ही, अन्तःतम आलोकित होता॥
मौन हृदय की शुष्क धरा पर, करुणा-मेघ बरस जाते,
एक मधुर उच्चारण से ही, रूठे प्राण सँवर जाते॥
एक वचन यदि सत्य-सूर्य हो, मिथ्या-तम विलीन हो जाए,
एक करुणा-कण से पत्थर भी, पिघल सरिता बनता जाए॥
शब्द कभी संजीवनी बनकर, मृत आशा में प्राण भरें,
शब्द कभी वज्राग्नि बनकर, जड़ता के दुर्गों को हरें॥
जिन शब्दों में प्रेम-प्रभा हो, मरुभूमि में फूल खिलें,
जिन शब्दों में सत्य-ज्योति हो, तम के सहस्र कपाट खुलें॥
वाणी स्वार्थातीत हुई तो, मन्त्र-ज्योति बन जाती,
अक्षर-अक्षर में सुप्त चेतना, नूतन प्रभा जगाती॥
एक नाद जब सत्य-स्फुरित हो, युग-चेतना बन जाता,
एक पुकार सुप्त जन-मन में, नव-सूर्योदय कर जाता॥
अक्षर-अक्षर बीज बनाकर, चेतन-माटी में तुम बोओ,
सत्य-सुधा से सींच-सींचकर, मानवता के दीप संजोओ॥
जब अन्तर्मन स्वयं बदलता, तब संसार बदलने लगता,
चेतन-ज्योति जगे तो भीतर, युग का तम गलने लगता॥
शब्द को ब्रह्म समझकर, निज अन्तर में नाद जगाओ,
उसी अनाहत स्वर से फिर, सुप्त चेतना को झंकृत पाओ॥
शब्दों में ही जग का स्पन्दन, शब्दों में ही नव-संसार,
सत्य-प्रेम से दीप्त वाणी, बन सकती परिवर्तन-धार॥
जब शब्दों में चेतन-ज्योति हो, हर अक्षर हो दीप अपार,
उनकी अनहद ध्वनि से जागे, नव-सृष्टि का चेतन संसार॥
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X