किस मेघ-गर्भ के मौन हृदय में, चेतन-बीज पनपता है?
किस वर्षा-बिंदु के स्पर्शों से, अन्तःदीप झिलमिलता है?॥
भीगी मिट्टी की गंध बनाकर, स्मृति अनादि मुस्काती है।
सूखे प्राण-वनों की धरती में, नव-अंकुर हरियाती है॥
वन-पल्लव की मृदु थिरकन में, कोई निःशब्द निमंत्रण है।
बूँदों की झंकारों के भीतर, आत्मस्वर का स्पंदन है॥
चपला की क्षणिक उजासों में, तम का आवरण गल जाता।
मन का घन-अम्बर निर्मल होकर, स्वयं गगन-सा हो जाता॥
बहती सरिता कहती धीमे, छोड़ो संचित सब जड़ता को।
सागर बनने की अभिलाषा, सौंपो निर्मल सरलता को॥
जब इच्छाएँ धुल जाती हैं, वर्षा की निष्काम लयों में।
तब शिवत्व स्वयं प्रकट होता, प्राणों की गहन दिशाओं में॥
पात-पात पर लिखी प्रकृति जब, मौन उपनिषद् पढ़ने लगती।
श्वास-श्वास में ऋत की वीणा, आत्मप्रभा फिर उगने लगती॥
सावन बाहर नहीं उतरता, पहले भीगता अन्तर-मन।
ऋतु तब केवल ऋतु न रहती—जगता शिवत्व का स्पंदन॥
- सनातन मुकुंद
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