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सावन कजरी: सखी संवाद

                
                                                         
                            सावन रितु आई, उमड़ि-घुमड़ि बदरिया घिरि आई,
                                                                 
                            
अरी सखियन! झूला डारव, काहे अब सकुचाई॥

देख सखी! ई घटा गगन म कइसन कजरी छाई,
पी-पी बोलत पपीहा, मोरे साजन क याद दिलाई।

अरे री! तूँ त जनि रोव, झूला प मनवा डोलै,
देखा न! मोर-पपीहा संगे, बनवा म रस घोलै॥

सावन रितु आई, उमड़ि-घुमड़ि बदरिया घिरि आई,
अरी सखियन! झूला डारव, काहे अब सकुचाई॥

री बहिनी! पिया मोरे परदेस, हमका नाहीं सुहावै,
सगरी सखी झूलैं-गावैं, मोर जियरा जरावै।

चुप रह पगली! सावन म मन-मइल बहाय दे,
धानी ओढ़निया ओढ़ि ले, कंगन खनकाय दे॥

सावन रितु आई, उमड़ि-घुमड़ि बदरिया घिरि आई,
अरी सखियन! झूला डारव, काहे अब सकुचाई॥

देख! बिजुरिया चमके, कइसे डर से हम थर्राईं,
जल्दी बाँह पकड़ि ले, सखी! तोहरे लगे आइँ।

डर जिन, अब हाथ बढ़ाव, हम झूला खूब झुलाइँ,
हँसि-हँसि गीत गावत, हम मिलिके कजरी गाइँ॥

सावन रितु आई, उमड़ि-घुमड़ि बदरिया घिरि आई,
अरी सखियन! झूला डारव, काहे अब सकुचाई॥

सुन सखियन! अब काल्ह मेला म हम जाइब,
गुझिया-पूरी बनइब, घुमब, ढेर मउज मनाइब।

सावन क ई मिठास, हमहूँ मिलिके बटोरि लीं,
सखी! तू संग रहिहा, दुखुवा सब बिसराइ दीं॥

सावन रितु आई, उमड़ि-घुमड़ि बदरिया घिरि आई,
अरी सखियन! झूला डारव, काहे अब सकुचाई॥

झूला झूलीं, कजरी गाईं, सावन हँसि मुसुकावै,
इहे अवध क लोक-रीति, पीढ़ी-दर-पीढ़ी गावै॥

- श्री सनातन मुकुंद
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2 महीने पहले

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