सलोनी साँसों में सुरभित सरगम छाया रे,
माटी की सोंधी सुरभि से जग मुस्काया रे।
दिन-रैन मेघामृत से सिंचित धरा सुहानी रे,
सप्तस्वरों में गूँज उठा जग—सावन आया रे!
बादल बाँह पसारे धरती से मिलने आया रे,
दामिनि दमके, मलयानिल प्रेम-राग सुनाया रे।
हरित वसन पहने धरा, नव शृंगार सजाया रे,
प्रकृति विहँसकर बोल उठी—सावन आया रे!
प्रेम-सुधा बरसे चहुँओर, तन-मन हरसाया रे,
मन-मयूर के पंखों में मधुर मल्हार समाया रे।
रिमझिम राग झरे, दादुर मधुर तान सुनाया रे,
सकल नर-नारी कजरी गाएँ—सावन आया रे!
- श्री सनातन मुकुंद
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