अरुण-किरण-कमनीय-कान्ति-कदम्बिनी-कुसुमित-वदन-विभा विलसति,
नील-निशा-निचित-नव-मेघ-मुकुलित-अलकावलि अम्बर-सी लसति।
मन्द-मृदु-मधुर-मधुस्मित-मञ्जुल-मकरन्द-मयूख-माला बरसति,
दृष्टि-द्युति-दलित-दिनमणि-दर्प-दिगन्त-दिशा-दिशि दिव्य-प्रभा हँसति॥१॥
भ्रू-भङ्गिमा-भुवन-भेदिनी, मनसिज-कोदण्ड-कला भी लजाती,
दीर्घ-दयामय-दृग-दीपशिखा तम-ताप-तिमिर-तरु-शाखा जलाती।
अधर-अमृत-अरुणाभ-अलंकारित ऋतमयी वाणी वेद सुनाती,
श्रवण-सुधा-सरिता-सी बहकर चिर-शुष्क-हृदय-भूमि हरित बनाती॥२॥
मन्द-मराल-विलास-विहारिणी गति, मलयानिल-माधुरी साथ लिए,
पद-पद-पल्लव-पावन-पृथ्वी पुलकित, पुण्य-प्रभा के पराग पिए।
लज्जा-लता ललाट-विलसिता, शील-सरोरुह शशि-किरणों से जिए,
रूप नहीं—ऋत, शिव, सत्य-सुगन्धित चेतना, विश्व-विभूति बन हृदय जिए॥३॥
मणि-मुक्ता-मेखला-मुकुट-मञ्जीर-महिमा सब मौन नतशिर हो जाए,
काञ्चन-कान्ति स्वयं कलुषित लगे, यदि सहज-सुषमा सम्मुख आ जाए।
चित्र-विचित्र-विलास-विन्यास-विधाता भी चित्रित कर विस्मय खाए,
विधि-विनिर्मित विभव-विलक्षण यह, विधि भी निज-विधि पर लज्जा पाए॥४॥
ममता-महिमा मातृ-सरस्वती, मेधा में सावित्री-शक्ति प्रबुद्ध,
धैर्य हिमाद्रि, दया सुरसरिता, सत्य-सुगन्धित मानस विशुद्ध।
रूप जहाँ सद्गुण-सौरभ-संयुत, वहीं चिरन्तन सौन्दर्य समृद्ध,
ऐसी तरुणी में दीप्त दिखाई देती सृष्टि-स्मिता, परमात्मा की बुद्ध॥५॥
रूप यदि केवल नेत्र-विनोद बने, क्षणभंगुर छाया बन मिट जाएगा,
शील-सुधा से संयुक्त लावण्य युग-युग तक लोक-हृदय में गाया जाएगा।
देह-द्युति धूलि-सम विलीन होगी, आत्म-प्रभा अमरत्व जगाएगा,
नारी में नित नारायणी-ज्योति का दर्शन ही मानव को देव बनाएगा॥६॥-सनातन मुकुंद
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