आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

संस्कारों की दीपशिखा : सांस्कृतिक मूल्यपरक गीतिका

                
                                                         
                            सौंधी माटी महक उठे, जब मंगल-मंत्र जगे,
                                                                 
                            
पीढ़ी-पलकों पर संस्कृति के, स्वर्णिम स्वप्न जगे।

माँ की ममता मधु बन बरसे, करुणा-कुसुम खिलाए,
पिता-तपस्या सत्य-दीप बन, जीवन-पथ चमकाए।

गुरु-वाणी गंगाधार बने, अंतर-तम सब धोए,
ज्ञान-ज्योति प्राणों में जलकर, मोह-भ्रम सब खोए।

संयम जिसकी सुरभि बने, सेवा जिसका श्रृंगार,
त्याग जहाँ भूषण बन जाए, उज्ज्वल हो व्यवहार।

सत्कर्मों का तेल भरे जब, जीवन की हर बाती,
एक दीप से दीप जले तो, बढ़ती जाए ज्योति।

वंश नहीं, संस्कार बचाएँ, वैभव नहीं, सदाचार,
निर्मल चरित्रों से ही तो, मानव होता साकार।

चरणों में श्रद्धा झुकी रहे, वाणी मधुर विनीत,
बड़ों के प्रति नमन रहे, छोटों पर स्नेह पुनीत।

दुःख में भी आशीष बहे, सुख में न हो अभिमान,
अपने हिस्से धूप समेटे, जग को दे शीतल प्राण।

निज-सुख से ऊपर उठकर जब, परहित का भाव जगे,
सोई हुई मानवता में, करुणा की निर्मल ज्योति जगे।

विश्व-बंधुत्व की भावना से, हर अंतर्मन सेतु बने,
घृणा पिघले, करुणा बरसे, स्नेह-संबंध सघन बनें।

घर-घर ऐसी दीपशिखा हो, तम का तांडव हारे,
चरित्रों की निर्मल सरिता, युग के कलुष निखारे।

आओ ऐसी ज्योति जलाएँ, आँधी जिसे न बुझाए,
हमसे लेकर भावी पीढ़ी, मानव-मूल्य बचाए।
-सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर