जब तम का तट घिर आए,
जब दिशाओं के दीप बुझ जाएँ,
जब पथ पर काँटे उग आएँ,
तब अंतर-दीप स्वयं जलाएँ।
आँधी चाहे वेग बढ़ाए,
बादल चाहे नभ ढक जाएँ,
दीपक बनकर अडिग रहें हम,
अंतर में प्रकाश जगाएँ।
पर्वत पथ में अड़कर आए,
पग को पीछे मत हटाएँ,
शिखरों से ऊँची दृष्टि रख,
शिलाओं में पथ बनाते जाएँ।
सागर सीमा बनकर आए,
लहरें राह रोकती जाएँ,
साहस की नौका लेकर
क्षितिज-पार हम बढ़ते जाएँ।
भाग्य भले रेखाएँ खींचे,
कर्म उन्हें फिर मोड़ सकेगा,
पुरुषार्थ धरा को सींचे,
बीज नया अंकुरित होगा।
हार मिले तो हार न मानो,
घाव मिले तो राह न छोड़ो,
टूटे स्वप्नों के कण चुनकर
नव स्वप्नों की माला जोड़ो।
संकल्प केवल शब्द न हो,
क्षणिक तरंगों में न खोए,
कर्म-अग्नि में तपकर निकले,
जीवन का नवाकार गढ़ें।
जब मन दृढ़ संकल्पित होता,
असंभव भी झुकने लगता,
मौन पड़ा पुरुषार्थ अचानक
भाग्य-द्वार पर दस्तक करता।
अंतर में जो दीप जलाओ,
उसकी लौ को मंद न होने दो,
पथ चाहे जितना दुर्गम हो,
अपने पग को थमने न दो।
संकल्पशक्ति वह ज्वाला
जो तम को आलोकित करती,
गिरकर फिर उठने की शक्ति,
जीवन की दिशा बदलती।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X